न सफ़र न मंज़िल ।।

न सफ़र हमारा है, न मंज़िल ,

कश्मकश में बढ़े ,

जो संभले तो क़ाबिल

गर बिखरे तो काफ़िर ।

पर ये क्या यहाँ ,

हर तरफ़ नापा -नापी है,

कितने गहरे , कितने लंबे ,

ये कैसी आपा धापी है,

दौड़ है खनक की,

पल में है चमकती,

पल में है भटकती,

अब सोच में डूबे है,

ऐसे सफ़र से क्या है हासिल।

शायद तभी,

न सफ़र हमारा है, न मंज़िल।।

एक मोड़ पर रुके ,

साथ लगे कहकहे ,

आँख से ओस गिरी,

कुछ नये रिश्ते बुने,

लगा सफ़र थम गया

पर रात भर ही रहा ये समा

फिर से कुछ नये क़दम चलने पड़े,

नये धागे बुनने पड़े ,

ये खेल बड़ा है मुश्किल ,

पर न सफ़र हमाराहै, न मंज़िल।।

आगे राह में क्या है,

ये किसको पता है,

कोई पहाड़ भारी है,

या मख्मल पर चलना है,

कोई उलझी कहानीहै,

या साँस सा गुज़रना है,

कोई ख़ून है बाक़ी ,

या पड़ना कोई कलमा है,

कोई इश्क़ है होना,

या बस यूँही भटकना है,

कौन मसीहा यहाँ, कौन है क़ातिल

न सफ़र हमारा है, न मंज़िल।। DJ

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